Sunday, 31 March 2013

श्रीमद् भागवद् गीता - अध्याय-1


प्रथमोऽध्याय

अर्जुन विषाद योग
धृतराष्ट्रोवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश् चैव किम् अकुर्वत सञ्जय ॥१॥
धृतराष्ट्र ने कहा
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र मेँ युद्ध के लिए मेरे और पांडु के बेटे इकट्ठे हो गए, तो उन्होँ ने क्या किया, संजय, बताओ तो.
सञ्जयोवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस् तदा ।
आचार्यम् उपसङ्गम्य राजा वचनम् अब्रवीत् ॥२॥
संजय ने कहा
पांडवोँ की व्यूहबद्ध सेना को देख कर दुर्योधन आचार्य द्रोण के पास गया और बोला –
पश्यैतां पाण्डु-पुत्राणाम् आचार्य महतीँ चमूम् ।
व्यूढां द्रुपद-पुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥
पांडवोँ की विशाल सेना को देखिए, आचार्य. इस की व्यूह रचना द्रुपद के बेटे और आप के शिष्य चतुर धृष्टद्युम्न ने की है.
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुन-समा युधि ।
युयुधानो विराटश् च द्रुपदश् च महारथः ॥४॥
बड़े बड़े धनुषोँ वाले अर्जुन और भीम जैसे शूरवीर योद्धा इस मेँ हैँ. सत्यक का बेटा युयुधान है, विराट, महारथी द्रुपद…
धृष्टकेतुश् चेकितानः काशिराजश् च वीर्यवान्।
पुरुजित् कुन्तिभोजश् च शैब्यश् च नर-पुङ्गवः ॥५॥
धृष्टकेतु और उस का पुत्र चेकितान और वीर्यवान काशिराज हैँ… पुरुजित, उस का पिता कुंतिभोज, और पुरुषश्रेष्ठ शैव्य है…
युधामन्युश् च विक्रान्त उत्तमौजाश् च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश् च सर्व एव महारथाः ॥६॥
विक्रमशाली युधामन्यु, उस का वीर भाई उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु है के साथ साथ द्रौपदी के पाँचोँ पुत्र हैँ. सब के सब महारथी हैँ.
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥७॥
हमारे भी ख़ास ख़ास योद्धाओँ को आप जान लीजिए. ब्राह्मणश्रेष्ठ द्रोण, मेरी सेना के नायकोँ के नाम भी सुनिए…
भवान् भीष्मश् च कर्णश् च कृपश् च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश् च सौमदत्तिस् तथैव च ॥८॥
आप, भीष्म, कर्ण, रणजीत कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा तो हैँ ही…
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्त-जीविताः ।
नाना-शस्त्र-प्रहरणाः सर्वे युद्ध-विशारदाः ॥९॥   
और भी बहुत से शूरवीर हैँ. सब ने मेरे लिए जान लगा दी है, सब शस्त्रोँ से सज्जित और युद्ध की कला मेँ माहिर हैँ…
अपर्याप्तं तद् अस्माकं बलं भीष्माऽऽभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदम् एतेषां बलं भीमाऽऽभिरक्षितम् ॥१०॥
हमारी सेना यूँ तो कम है, लेकिन इन लोगोँ की सेना को जीतने के लिए काफ़ी है – क्योँ कि कहाँ हमारे रक्षक भीष्म! और कहाँ इन का रक्षक भीम…
अयनेषु च सर्वेषु यथा-भागम्-अवस्थिताः ।
भीष्मम् एवाऽऽभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥११॥
इस लिए सब मोर्चोँ पर नियुक्त आप सब लोग भीष्म की रक्षा करेँ.
सञ्जयोवाच
तस्य सञ्जनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्यौच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥१२॥
संजय ने कहा
दुर्योधन को हर्ष पहुँचाने के लिए कौरवकुलश्रेष्ठ महाप्रतापी भीष्म पितामह शेर की तरह दहाड़ उठे. उन्होँ ने शक्तिशाली शंख ज़ोर से फूँक दिया.
ततः शङ्खाश् च भेर्यश् च पणवानक-गोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस् तुमुलोऽभवत् ॥१३॥
फिर तो शंख, रणभेरियाँ, ढोल, मृदंग, गोमुख और नरसिंघे बज उठे. भारी शोर होने लगा.
ततः श्वेतैर्-हयैर्-युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश् चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४॥
इस पर सफ़ेद घोड़ोँ वाले बड़े रथ पर सवार माधव कृष्ण और पांडव अर्जुन सवार ने भी जवाब मेँ दिव्य शंख फूँक दिए.
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५॥
हृषिकेश कृष्ण ने पांचजन्य शंख बजाया. धनंजय अर्जुन ने देवदत्त बजाया. बड़े बड़े काम करने वाले वृकोदर भीम ने महाशंख पौंड्र बजा दिया.
अनन्तविजयं राजा कुन्ती-पुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश् च सुघोष-मणिपुष्पकौ ॥१६॥
राजा धृतराष्ट्र, कुंती के पुत्र युधिष्ठिर ने अनंतविजय शंख बजाया. नकुल ने सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक.
काश्यश् च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश् च सात्यकिश् चापराजितः ॥१७॥
महान धनुर्धर काशी नरेश और महारथी शिखंडी और धृष्टद्युम्न, विराट तथा अपराजित सात्यकि…
द्रुपदो द्रौपदेयाश् च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश् च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक् ॥१८॥
द्रुपद, और द्रौपदी के बेटोँ, और सुभद्रा के पुत्र महाबाहु अभिमन्यु ने भी शंख फूँक दिए.
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश् च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥१९॥
इस महाघोष से धृतराष्ट्रवंशियोँ के दिल फट गए. आकाश और धरती मेँ तुमुल नाद होने लगा.
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्र-सम्पाते धनुर् उद्यम्य पाण्डवः ॥२०॥
अब आप के पुत्रोँ की व्यवस्थित सेना को अर्जुन ने देखा. उस के रथ की ध्वजा पर हनुमान का चित्र फरफरा रहा था. हथियार चलने ही वाले थे. अर्जुन ने धनुष उठा लिया.
हृषीकेशं तदा वाक्यम् इदम् आह महीपते ।
महीपति धृतराष्ट्र, तब अर्जुन ने हृषीकेश से कहा –
अर्जुनोवाच
सेनयोर् उभयोर् मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥२१॥
अर्जुन ने कहा
अच्युत, मेरा रथ दोनोँ सेनाओँ के बीच खड़ा कर दो…
यावद् एतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् ।
कैर् मया सह योद्धव्यम् अस्मिन् रण-समुद्यमे ॥२२॥
एक नज़र देखूँ तो सही, कौन हैँ जो युद्ध की इच्छा से डटे हैँ. कौन हैँ जो इस रण मेँ मुझ से जूझने आए हैँ.
योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर् युद्धे प्रिय-चिकीर्षवः ॥२३॥
देखूँ तो सही कौन कौन लड़ाके आए हैँ. युद्ध मेँ धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि बेटे का भला चाहने वाले कौन लोग हैँ.
सञ्जयोवाच
एवम् उक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोर् उभयोर् मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥२४॥
संजय ने कहा
हृषीकेश कृष्ण ने गुडाकेश अर्जुन की बात सुन कर रथ दोनोँ सेनाओँ के बीच खड़ा कर दिया.
भीष्म-द्रोण-प्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरून् इति ॥२५॥
सामने थे भीष्म और द्रोण. अन्य सभी राजा भी दिखाई दे रहे थे. कृष्ण ने कहा, ‘पार्थ, कुरुवंशियोँ के इस समूह को देख!''
तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितृन् अथ पिता महान् ।
आचार्यान् मातुलान् भ्रातृन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस् तथा ॥२६॥
पृथा के पुत्र अर्जुन ने देखा : सामने उस के पुरखे और दादा खड़े हैँ, साथ हैँ आचार्य और मामा, भाईबंद,बेटे और पोते, संगी साथी
श्वसुरान् सुहृदश् चैव सैनयोर् उभयोर् अपि ।
तान् समीक्ष्य स कौन्तैयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान् ॥२७॥
ससुर, सगे संबंधी दोनोँ ही सेनाओँ मेँ खड़े हैँ. कुंती के पुत्र अर्जुन सब को देखा.
कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्न् इदम् अब्रवीत् ।
मन भारी करुणा से भर उठा. खिन्न हो कर वह बोला-
अर्जुनोवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥२८॥
अर्जुन ने कहा
मेरे सारे अपने आमने सामने खड़े हैँ और मरने मारने पर उतारू हैँ.
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश् च शरीरे मे रोमहर्षश् च जायते ॥२९॥
मेरा अंग अंग ठंडा हो रहा है. मुँह सूख रहा है. शरीर काँप रहा है. रोमांच हो आया है.
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्य् अवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥३०॥
गांडीव धनुष हाथ से छूट रहा है. त्वचा दहक रही है. खड़ा नहीँ रहा जा रहा. मन चकरा रहा है.
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनम् आहवे ॥३१॥
शकुन भी उलटे दिखाई पड़ रहे हैँ. केशव, अपने लोगोँ की हत्या करने मेँ मुझे कुछ भला नहीँ दिखाई देता.
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर् जीवितेन वा ॥३२॥
कृष्ण, न मुझे विजय चाहिए, न राज्य, न सुख. गोविंद, हमेँ राज्य मिल भी जाए, तो क्या? अपनोँ को मार कर जीवन के भोग पाना... क्योँ, किस लिए?
येषाम् अर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
ते इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस् त्यक्त्वा धनानि च ॥३३॥
जिन के लिए राज्य चाहिए, संसार का भोग चाहिए, सुख चाहिए, वे सब तो यहाँ युद्ध मेँ खड़े हैँ! सभी ने प्राण और धन की बाज़ी लगा दी है.
आचार्याः पितरः पुत्रास् तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस् तथा ॥३४॥
सब के सब, ये मेरे आचार्य – मेरे गुरु, मेरे पितर – ताऊ चाचा, बेटे, बाबा दादा, मामा, ससुर, पोते,साले, सगे संबंधी…
एतान् न हन्तुम् इच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्य-राज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥३५॥
मैँ इन्हेँ मारना नहीँ चाहता, चाहे मेरी जान चली जाए. मधुसूदन, बदले मेँ चाहे तीनोँ लोकोँ का राज्य ही क्योँ न मिलता हो! थोड़ी सी धरती की तो बात ही क्या!
निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज् जनार्दन ।
पापं एवाश्रयेद् अस्मान् हत्वैतान् आततायिनः ॥३६॥
धृतराष्ट्र के बेटोँ को मार डालने से, जनार्दन, क्या भला होगा? माना ये आततायी हैँ. लेकिन इन्हेँ मार कर हमेँ तो हत्या ही लगेगी.
तस्मान् नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥३७॥
इस लिए धृतराष्ट्र के बेटोँ को मारना हमारे लिए उचित नहीँ है. हैँ तो हमारे बंधु ही. अपने कुटुंबियोँ को मार कर,माधव, हम सुखी कैसे हो सकते हैँ?
यद्यप्य् एते न पश्यन्ति लोभोपहत-चेतसः ।
कुल-क्षय-कृतं दोषं मित्र-द्रोहे च पातकम् ॥३८॥
ये तो कुछ देख नहीँ पा रहे हैँ. लोभ ने इन की बुद्धि को हर लिया है. इन्हेँ नहीँ पता कि कुल का नाश करने से क्या दोष लगता है और मित्रोँ से द्रोह का क्या पाप होता है.
कथं न ज्ञेयम् अस्माभिः पापाद् अस्मान् निवर्तितुम् ।
कुल-क्षय-कृतं दोषं प्रपश्यद्भिर् जनार्दन ॥३९॥
लेकिन हम इस पाप से बचने की बात क्योँ नहीँ सोचते? कुल के नाश से क्या दोष होता है – यह हमेँ तो दिखाई दे रहा है, जनार्दन.
कुल-क्षये प्रणश्यन्ति कुल-धर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्य् उत ॥४०॥
कुल का नाश होने से कुल के तमाम सनातन धर्मोँ का नाश हो जाता है. धर्म का नाश हो जाए तो पूरे कुल को अधर्म दबोच लेता है.
अधर्माऽऽभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्ण-सङ्करः ॥४१॥
कृष्ण, अधर्म बढ़ता है तो कुल की स्त्रियाँ प्रदूषित हो जाती हैँ. स्त्रियोँ के दूषित होने पर वर्णसंकर पैदा होने लगते हैँ.
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्त-पिण्डोदक-क्रियाः ॥४२॥
वर्णसंकर कुलनाशकोँ को ही नहीँ, पूरे कुल को, नरक की ओर ले जाते हैँ. यही नहीँ. उन के पितरोँ का भी पतन हो जाता है – क्योँ कि पिंडदान और तर्पण आदि क्रियाओँ का लोप हो जाता है.
दोषैर् एतैः कुलघ्नानां वर्ण-सङ्कर-कारकै ।
उत्साद्यन्ते जाति-धर्माः कुल-धर्माश् च शाश्वता ॥४३॥
वर्णसंकर को जन्म देने वाले इन दोषोँ से कुलघातियोँ के सभी शाश्वत जाति धर्म और कुल धर्म नष्ट हो जाते हैँ.
उत्सन्न-कुल-धर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्य् अनुशुश्रुम ॥४४॥
जिन मनुष्योँ के कुल धर्म नष्ट हो जाते हैँ, जनार्दन, उन्हेँ अनियत काल तक नरक मेँ रहना पड़ता है. मैँ ने तो यही सुना है.
अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद् राज्य-सुख-लोभेन हन्तुं स्वजनम् उद्यताः ॥४५॥
हाय! महाशोक! हम महापाप करने को तैयार हैँ. राज्य और सुख के लोभ मेँ हम अपने लोगोँ की हत्या करने पर उतर आए हैँ.
यदि माम् अप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस् तन् मे क्षेमतरं भवेत् ॥४६॥
मैँ आक्रमण का जवाब न दूँ, हथियार डाल दूँ, धृतराष्ट्र के हथियारबंद बेटे रण मेँ मुझे मार डालेँ, तो भी यह बेहतर होगा.
सञ्जयोवाच
एवम् उक्त्वाऽऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोक-संविग्न-मानसः ॥४७॥
संजय ने कहा
यह कह कर अर्जुन रथ मेँ बैठ गया. उस ने धनुष बाण डाल दिए. मन शोक से विह्वल था.
इति श्रीमद्-भगवद्-गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्म-विद्यायां योग-शास्त्रे श्री-कृष्णार्जुन-संवादेऽर्जुन-विषाद-योगो नाम प्रथमोऽध्यायः
यह था श्रीमद् भगवद् गीता नामक उपनिषद ब्रह्म विद्या योग शास्त्र श्री कृष्ण अर्जुन संवाद मेँ अर्जुन विषाद योग नाम का पहला अध्याय

Thursday, 14 March 2013

महाभारतोक्त-रुद्राभिषेकस्तोत्रम्

ॐ

ॐ सर्वदेवेभ्यो नम :

ॐ नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च ।
पशूनां पतये नित्यमुग्राय च कपर्दिने ॥1॥

महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय च शान्तये ।
ईशानाय मखघ्नाय नमोऽस्त्वन्धकघातिने ॥2॥

कुमारगुरवे तुभ्यं नीलग्रीवाय वेधसे ।
पिनाकिने हिवष्याय सत्याय विभवे सदा ॥3॥

विलोहिताय धूम्राय व्याधायानपराजिते ।
नित्यनीलिशखण्डाय शूलिने दिव्यचक्षुषे ॥4॥

हन्त्रे गोप्त्रे त्रिनेत्राय व्याधाय वसुरेतसे ।
अचिन्त्यायाम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय च ॥5॥

वृषध्वजाय मुण्डाय जिटने ब्रह्मचारिणे ।
तप्यमानाय सिलले ब्रह्मण्यायाजिताय च ॥6॥

विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते ।
नमो नमस्ते सेव्याय भूतानां प्रभवे सदा ॥7॥

ब्रह्मवक्त्राय सर्वाय शंकराय शिवाय च ।
नमोऽस्तु वाचस्पतये प्रजानां पतये नम: ॥8॥

नमो विश्वस्य पतये महतां पतये नम: ।
नम: सहस्रिशरसे सहस्रभुजमृत्यवे ।
सहस्रनेत्रपादाय नमोऽसंख्येयकर्मणे॥9॥

नमो हिरण्यवर्णाय हिरण्यकवचाय च ।
भक्तानुकिम्पने नित्यं सिध्यतां नो वर: प्रभो ॥10॥

एवं स्तुत्वा महादेवं वासुदेव: सहार्जुन: ।
प्रसादयामास भवं तदा ह्यस्त्रोपलब्धये ॥11॥

॥ इति शुभम् ॥

विधि: तांबेका लोटा लेकर उसमें शुध्ध पानी, दूध, चोखा (चावल), बिल्व पत्र, दुर्वा, सफेद तिल, मिलाकर शिवलिंग उपर धृतधारा चालु रखके उपरोक्त लघुरुद्राभिषेक का पठन ग्यारा बार श्रध्धापूर्वक करने से जीवन में आयी हुई और आनेवाली आधि, व्याधि और उपाधि से छुटकारा मिलता है और सुख शांति प्राप्त होती है ।

रुद्राक्ष

एकमुखी रुद्राक्ष भगवान शिव, द्विमुखी श्री गौरी-शंकर, त्रिमुखी तेजोमय अग्नि, चतुर्थमुखी श्री पंचदेव, षष्ठमुखी भगवान कार्तिकेय, सप्तमुखी प्रभु अनंत, अष्टमुखी भगवान श्री गेणश, नवममुखी भगवती देवी दुर्गा, दसमुखी श्री हरि विष्णु, तेरहमुखी श्री इंद्र तथा चौदहमुखी स्वयं हनुमानजी का रूप माना जाता है। इसके अलावा श्री गणेश व गौरी-शंकर नाम के रुद्राक्ष भी होते हैं।
एकमुखी रुद्राक्ष
ऐसा रुद्राक्ष जिसमें एक ही आँख अथवा बिंदी हो। स्वयं शिव का स्वरूप है जो सभी प्रकार के सुख, मोक्ष और उन्नति प्रदान करता है।
द्विमुखी रुद्राक्ष
सभी प्रकार की कामनाओं को पूरा करने वाला तथा दांपत्य जीवन में सुख, शांति व तेज प्रदान करता है।
त्रिमुखी रुद्राक्ष
ऐश्वर्य प्रदान करने वाला होता है।
Fourteen-face-rudraksha.jpg
चतुर्थमुखी रुद्राक्ष
धर्म, अर्थ काम एवं मोक्ष प्रदान करने वाला होता है।
पंचमुखी रुद्राक्ष
सुख प्रदान करने वाला।
षष्ठमुखी रुद्राक्ष
पापों से मुक्ति एवं संतान देने वाला होता होता है।
सप्तमुखी रुद्राक्ष
दरिद्रता को दूर करने वाला होता है।
अष्टमुखी रुद्राक्ष
आयु एवं सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाला होता है।
नवममुखी रुद्राक्ष
मृत्यु के डर से मुक्त करने वाला होता है।
दसमुखी रुद्राक्ष
शांति एवं सौंदर्य प्रदान करने वाला होता है।
ग्यारह मुखी रुद्राक्ष
विजय दिलाने वाला, ज्ञान एवं भक्ति प्रदान करने वाला होता है।
बारह मुखी रुद्राक्ष
धन प्राप्ति कराता है।
तरेह मुखी रुद्राक्ष
शुभ व लाभ प्रदान कराने वाला होता है।
चौदह मुखी रुद्राक्ष
संपूर्ण पापों को नष्ट करने वाला होता है।

रुद्राक्ष के लाभ

कभी कभी बहुत आम समस्याओं के हल बहुत आसानी से मिल जाते हैं। अभी तक मैंने जितनी भी चर्चा की वे समस्याओं को इंगित करती थी। अक्सर ज्योतिषी समस्याओं के समाधान की चर्चा करने से कतराते हैं। हर कोई चाहता है कि उसका ज्ञान-भंडार चोरी न हो जाए, कोई दूसरा न ले जाए। खैर वह समस्या उनकी है वे जाने। हम चर्चा कर रहे थे समाधान की। यदि सर्व-सामान्य समस्याएँ देखें तो वे हैं –
  • सदैव अनिश्चितता महसूस करना
  • मन का बरबस उचाट हो जाना
  • मानसिक दबाव (डिप्रेशन) का शिकार रहन
  • एकाग्रता की कमी होना – बच्चे या बडे दोनों
इन समस्याओं में किसी से आपका कोई भी जानकार ग्रसित हो तो, इच्छा ईश्वर की, 5 मुखी रुद्राक्ष पहनने से लाभ होता है।
5 मुखी रुद्राक्ष सबसे आम, आसानी से मिलने वाला व सभी रुद्राक्षों में सबसे सस्ता है। कीमत किसी भी नग की गुणवत्ता का मापदण्ड नहीं है। यह जानकारी सिर्फ आपके लाभार्थ है।
धारण करने हेतु रुद्राक्ष को काले धागे मे पिरो लें या चाँदी की तार पिरो कर लॉकेट बनवा लें। सोने की तार में पिरोए जाने की सिफारिश नहीं है। इसे गले में अपने दिल के सामने लटकता हुआ पहनें। ध्यान रहे कि वह पहने वाले की त्वचा को जरूर छुए।
आशा करता हूँ कि यह जानकारी लाभकारी होगी। आने वाले दिनों में कुछ और उपायों की चर्चा करूँगा। आपके सुझाव व विचार सदा ही लाभकारी होते हैं। सहयोग देते रहें।

Saturday, 2 March 2013

वैदिक एवं तान्त्रिक साधना

इस विशाल भारतीय संस्कृति का विश्लेषण करने पर प्रतीत होगा कि इसके विभिन्न अंश हैं , और अङ -प्रत्यङु रुप में इसके विभिन्न विभाग हैं । इसमें सन्देह नहीं कि इसमें ‘वैदिक -साधना ’ ही प्रधान है , किन्तु इसका भी ध्यान रखना चाहिए कि भिन्न -भिन्न समयों में इस धारा में नये -नये ववर्यन हो चुके हैं । धर्मशास्त्र , नीतिशास्त्र , इतिहास -पुराणादि के आलोचन से तथा भारतीय समाज के आन्तरिक जीवन का परिचय मिलने से उपर्युक्त तथ्य का स्पष्टतया ज्ञान होगा । वैदिकधारा का प्राधान्य होने पर भी , इसमें सन्देह नहीं है कि इसमें विभिन्न धाराओं का संमिश्रण है । इन सब धाराओं के भीतर यदि व्यापक दृष्टि से देखा जाय तो ज्ञात होगा कि ‘तन्त्र की धारा ’ ही प्रथम एवं प्रधान है । इस धारा की भी बहुत से दिशाएँ हैं , जिनमे एक वैदिकधारा के अनुकूल थी । अगली पीढियों के गवेषण -गण इस तथ्य का निरुपण करेंगे कि वैदिकधारा की जो उपासना की दिशा है , वह अविभाज्य रुप से बहुत अंशों में तान्त्रिकधारा से मिलि हुई है , और बहुत से तान्त्रिक विषय अति प्राचीन समय से परम्पराक्रम से चले आ रहे थे। उपनिषद् ‌ आदि में जिन विद्याओं का परिचय मिलता है , यथा संवर्ग , उद्‌गीथ , उपकोशल , भूमा , दहर , पर्यङ्क आदि , ये सभी विद्याएँ इसी के अन्तर्गत हैं । वेद के रहस्य अंश में भी इन सब रहस्य विद्याओं के परिज्ञान का आभास मिलता है । यहाँ तक कहा जा सकता है कि वैदिक क्रिया -काण्ड भी अध्यात्म -विद्या का ही बाह्य रुप है , जो निम्न अधिकारियों के लिए उपयोगी माना जाता था । यदि इन सब अध्यात्म -विद्याओं का रहस्य -ज्ञान कभी हो जाय , तो पता चलेगा कि मूलभूत वैदिक तथा तान्त्रिक या आगामिक ज्ञानों में विशेष भेद नहीं रहा ।
वेद एवं तन्त्रों की मौलिक दृष्टि यहाँ प्रसंगतः एक बात का उल्लेख आवश्यक है कि साधारण दृष्टि से संभव है यह समझ में न आवे , फिर भी यह सत्य है कि वेद और तन्त्र का निगूढ रुप एक ही प्रकार का है । दोनों ही अक्षरात्मक है , अर्थात् ‍ शब्दात्मक ज्ञान विशेष हैं । ये शब्द लौकिक नहीं दिव्य हैं , और अपौरुषेय हैं । मन्त्रदर्शीगण इसे ही प्राप्त कर सर्वज्ञत्व -लाभ किया करते थे ; वे अन्त में आत्मसाक्षात्कार के द्वारा अपना जीवन सफल करते थे । ‘पुराकल्प ’ में लिखा है --
यां सूक्ष्मां विद्याम् ‍ अतीन्द्रियां वाचम् ‍ ऋषयः साक्षात्कृतधर्माणः मन्त्रदृशः पश्यन्ति , ताम् ‍ असाक्षात्कृतधर्मेभ्यः प्रतिवेदयिष्यमाणा बिल्मं समामनन्ति , स्वप्रवृत्तमिव दृष्टश्रुतानुभूतम् ‍ आचिख्यासन्ते ।
निरुक्त प्रभृति ग्रन्थों के आलोचन से यह प्रतीत होता है कि ऋषिगण साक्षात्कृत -धर्मा थे और वे उन सामान्य लोगों को उपदेश द्वारा मन्त्र -दान करते थे , जो असाक्षात्कृतधर्मा थे । साक्षात्क्रृतधर्मा होने के कारण ऋषिगण वस्तुतः शक्तिशाली थे , अतः वे किसी से उपदेश -श्रवण करके ऋषित्व -लाभ नहीं करते थे ; प्रत्युत वे स्वयं वेदार्थ -दर्शन करते थे । इसी अभिप्राय से उन्हें मन्त्रद्रष्टा कहा जाता है । मन्त्रार्थ -ज्ञान का मुख्य उपाय है प्रतिभान , इसे ही प्रातिभ या अनौपदेशिकं ज्ञान कहते हैं । इसी के विषय में कहा जाता है ---
गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः ।
गुरु शब्द से यहाँ अन्तर्गुरु या अन्तर्यामी समझना चाहिए । ऐसे उत्तम अधिकारियों को दृष्टर्षि भी कहा जाता है । शक्ति की मन्दता के कारण मध्यम अधिकारी इनसे अवर समझे जाते थे । इनका परिचय श्रुतर्षि नाम से मिलता है । उत्तम अधिकारी को दर्शन मिलता था उपदेश -निरपेक्ष होकर , और मध्यम अधिकारी को श्रवण -प्राप्त होता था उपदेश -सापेक्ष होकर । प्रथम ज्ञान का नाम आर्षज्ञान और द्वितीय का नाम औपदेशिक ज्ञान है । मनुसंहिता के अनुसार धर्मज्ञ वही है जो ऋषिदृष्ट वेद तथा तन्मूलक स्मृति शास्त्रों को वेदानुकूल तर्क से विचारता है ---
आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्रविरोधिना ।
यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥ मनु० १२ १०६
किन्तु साधारण अधिकारी को जो ज्ञान होता है , वह सत् ‌ तर्क के द्वारा । सत्तर्क से अभिप्रेत है वेद शास्त्र के अविरोधी तर्क के द्वारा अनुसंधान । आगम शास्त्र (त्रि० र० तथा त्रिकदार्शनिक साहित्य ) में सत्तर्क का विशेष रुप से मण्डन किया गया है । वैदिक साहित्य में भी यह लिखित मिलता है । ऋषिगण जब अन्तर्हित होने लगे तो तर्क पर ही ज्ञान का भार दिया गया । सभी साधारण जिज्ञासु लोग अवर -कोटि में है , हम सभी इसी कोटि के है । इस प्रकार के लिए सत्तर्क ही अवलम्बनीय है ।
आगम तन्त्र शास्त्रों के अनुसार तन्त्र का मूल आधार कोई पुस्तक नहीं है , वह अपौरुषेय ज्ञान विशेष है । ऐसे ज्ञान का नाम ही ‘आगम ’ है । यह ज्ञानात्मक आगम शब्दरुप में अवतरित होता है । तन्त्र -मत में परा -वाक् ‍ ही अखण्ड आगम है । पश्यन्ति अवस्था में यह स्वयं वेद्य रुप में प्रकाशित होता है और अपना प्रकाश अपने साथ रखता है । यही साक्षात्कार की अवस्था है , यहाँ द्वितीय या अपर में ज्ञान -संचार करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । वही ज्ञान मध्यमा वाक् ‍ में अवतीर्ण होकर ‘शब्द ’ का आकार धारण करता हैं और यह शब्द चित्तात्मक है । इसी भूमि में गुरु -शिष्य भाव का उदय होता है । फलतः ज्ञान एक आधार से अपर आधार में संचारित होता है । विभिन्न शास्त्रों एवं गुरु -परस्पराओं का प्राकट्य मध्यमा -भूमि में ही होता है । वैखरी में वह ज्ञान या शब्द जब स्थूल रुप धारण करता है , तब वह दूसरों के इन्द्रिय का विषय बनता है ।
उपर्युक्त संक्षित्प विवेचन से प्रतीत होगा कि वेद और तन्त्रों की मौलिक दृष्टि एक ही है यद्यपि वेद एक है किन्तु विभक्त होकर यह त्रयी या चतुर्विध होता है , अन्ततः वह अनन्त है। ‘वेदा अनन्ताः ’ यह भी वेद की ही वाणी है । आगमों की स्थिति भी ठीक इसी प्रकार की हैं । अवश्य ही तन्त्र की एक और भी दिशा है जिससे उसका वैदिक आदर्शो से किसी अंश में पार्थक्य प्रतीत होता है , और उस कारण से तान्त्रिक साधना का वैशिष्ट्य भी समझ में आता हैं । कुछ भी हो , ये सभी मिल कर भारतीय संस्कृति के अंगीभूत हो चुके है । जैसे बृहत् ‍ जलधारायें मिलकर नदी का रुप धारण करती है , और अन्त में महासमुद्र में विलीन हो जाती हैं ; वैसे ही वैदिक तान्त्रिक आदि अन्यान्य सांस्कृतिक -धारायें भारतीय संस्कृति में आश्रय -लाभ करती हैं और उसे विशाल से विशालत बनाती हैं ।

शिव - शिवा और तंत्र

अपार करुणामूर्ति जगज्जननी भगवती शिवा और शिव ही समस्त सृष्टि के स्रष्टा हैं । इनकी कृपा से ब्रह्मादि देव आविर्भूत होकर आदेशानुसार सृष्टि , स्थिति और संह्यति में प्रवृत्त होते हैं । अखिल ब्रह्मांडनायिका भगवती एवं अखिल ब्रह्मांडनायक भगवान् एकरुप होते हुए भी लोकानुग्रह के लिए द्विधा रुप ग्रहण करते हैं और दिव्य दम्पत्ति के रुप में शब्दर्थमयी सृष्टि को भी विकसित करते हैं । ये ही ब्रह्मस्वरुप हैं । इन्हीं के संवाद रुप में तंत्र सामने आया ।
वस्तुतः ब्रह्मा , विष्णु तथा शिव में कोई भेद नहीं हैं । लोक - कल्याण की उदार भावना से परस्पर संवाद रुप में , प्रश्नोत्तर रुप में कर्तव्य कर्मों का चिंतन प्रस्तुत करते रहे हैं । यह आवश्यक भी है , क्योंकि माता - पिता ही यदि बालकों की शिक्षा - व्यवस्था न करें तो और कौन करे ? जब स्वयं ब्रह्मादि देव भी प्रादुर्भूत होने के पश्चात् अबोध की भांति कोऽहं , कुतः आयातः , को मे जननी , को मे तातः ? इत्यादि नहीं जान पाए तो उन्हें भी इन्हीं ने कृपापूर्वक ज्ञान दिया था ।
कैलासवासी श्रीशिव
कैलासे शिखरे रम्ये नानारत्नोपशोभिते ।
नाना द्रुमलताकोर्णे नानापक्षिरवैर्युतः ॥
विविध प्रकार के रत्नों से शोभायमान , विविध प्रकार के वृक्षों एवं लताओं से युक्त , विविध प्रकार के पक्षियों के स्वरों से गुंजारित कैलास पर्वत का अत्यन्त रमणीय शिखर है ।
सर्वर्तुः कुसुमामोदं मोदिते सुमनोहरं ।
शैत्य - सौगन्ध्य - मन्दाढ्यैर्मरुदभि रुपवीजिते ॥
जहां समस्त ऋतुएं सुन्दर पुष्पों से युक्त हैं तथा जहां शीतल - सुगान्धित एवं मनमोहक वायु मन्द - मन्द गति से प्रवाहित हो रही है ।
अप्सरो गणसंगीत कलध्वनि निनादिते ।
स्थिरच्छायद्रुमच्छायाच्छादिते स्निग्ध मंजुले ॥
जहां अप्सराओं की सुन्दर ध्वनियां गूंज रही हैं , जहां वृक्षों की अनन्त छाया व्याप्त हैं ।
मत्तकोकिलसंदोह संघुष्टविपिनान्तरे ।
सर्वदा स्वर्गणः सार्ध ऋतुराजनिषेविते ॥
जिस ( पर्वत ) का वन मध्य प्रदेश प्रमत्त कोकिला के मधुर कूकों से मन मोह रहा है , कूजित हो रहा है , जहां ऋतुराज बसन्त सदैव अपने साथियों के साथ जिनकी सेवा में तत्पर रहता है ।
सिद्धचारण गन्धर्वैगाणपत्यगणैर्वृते ।
तत्र मौनधरं देवं चराचरजगदगुरुम् ॥
जो सिद्ध चारण गन्धर्व गणपति अपने गणों व षडानन के साथ निवास करते थे । ऐसे सुन्दर कैलास के शिखर पर जगत् के गुरु श्री शिवजी मौन धारण किए वास करते हैं ।
सदाशिवं सदानन्दं करुणाऽमृतसागरम् ।
कर्पूरकुन्दधवलं शुद्धं सत्वगुणमयं विभुम् ॥
शिवजी कल्याण करने वाले हैं , करुणा निधान हैं , आनन्दित करने वाले हैं , अमृत के अथाह सागर हैं , कपूर एवं कुन्द की भांति धवल सतोगुणी प्रभु पवित्र एवं गुणों से युक्त हैं ।
दीगम्बरं दीनानाथं योगीन्द्रं योगिवल्लभम् ।
गंगाशीकर संसिक्तंजटामण्डल मण्डितम् ॥
दस दिशामय वस्त्र धारण किए हुए दीनानाथ , योगीराज , योगियों के प्रिय , जिनकी जटाएं गंगा के जल से सदा भीगी रहती हैं ।
विभूतिभूषितं शान्तं व्यालमालं कपालिनम् ।
त्रिलोचनं त्रिलोकेशं त्रिशूलवरधारिणम् ॥
जिनके समस्त अंगों में भस्म विभूषित हो रही हैं । अत्यन्त शान्त स्वरुप हैं , ये त्रिलोकी नाथ ( गले में ) मुण्ड तथा सर्पों की माला धारण किए हैं तथा हाथ में त्रिशूल और वर मुद्रा पकड़े हुए हैं ।
आशुतोषं ज्ञानमयं कैवल्यफलदायकम् ।
निरातंकं निर्विकल्पं निर्विशेषं निरंजनम् ॥
अतिशीघ्र प्रसन्न होने वाले ज्ञान स्वरुप भगवान आशुतोष मोक्षदाता , निर्विशेष एवं साक्षात् स्वरुप हैं ।
सर्वेषां हितकारं देवदेवं निरामयम् ।
अर्द्धचन्द्रोज्ज्वलदभालं पञ्चवक्त्रं सुभूषितम् ॥
सब प्राणिमात्र का कल्याण करने वाल्व , हितैषी , निरामय , देवों के देव महादेव , अर्द्ध चन्द्रमा की ' चन्द्रिका ' जिनके मस्तक पर सुशोभित रहती है , सुन्दर आभूषणों से संपन्न पंचानन ( पांच मुख वाले ) हैं ।
प्रसन्नवदनं वीक्ष्य लोकानां हितकाम्यया ।
विनयेन समायुक्तो रावणः शिवमब्रवतीत् ॥
उन सदाशिव भगवान को अत्यन्त प्रसन्न मुख देखकर लोगों के हित की अभिलाषा से विनम्र होकर लंकाधिपति रावण भगवान शंकर से पूछता है ।

Wednesday, 6 February 2013

पाण्डवों का स्वर्गगमन

श्रीकृष्णचन्द्र से मिलने के लिये तथा भविष्य का कार्यक्रम निश्चित करने के लिये अर्जुन द्वारिकापुरी गये थे। जब उन्हें गये कई महीने व्यतीत हो गये तब एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर को विशेष चिन्ता हुई। वे भीमसेन से बोले – “हे भीमसेन! द्वारिका का समाचार लेकर भाई अर्जुन अभी तक नहीं लौटे। और इधर काल की गति देखो, सम्पूर्ण भूतों में उत्पात होने लगे हैं। नित्य अपशकुन होते हैं। आकाश में उल्कापात होने लगे हैं और पृथ्वी में भूकम्प आने लगे हैं। सूर्य का प्रकाश मध्यम सा हो गया है और चन्द्रमा के इर्द गिर्द बारम्बार मण्डल बैठते हैं। आकाश के नक्षत्र एवं तारे परस्पर टकरा कर गिर रहे हैं। पृथ्वी पर बारम्बार बिजली गिरती है। बड़े बड़े बवण्डर उठ कर अन्धकारमय भयंकर आंधी उत्पन्न करते हैं। सियारिन सूर्योदय के सम्मुख मुँह करके चिल्ला रही हैं। कुत्ते बिलाव बारम्बार रोते हैं। गधे, उल्लू, कौवे और कबूतर रात को कठोर शब्द करते हैं। गौएँ निरंतर आँसू बहाती हैं। घृत में अग्नि प्रज्जवलित करने की शक्ति नहीं रह गई है। सर्वत्र श्रीहीनता प्रतीत होती है। इन सब बातों को देख कर मेरा हृदय धड़क रहा है। न जाने ये अपशकुन किस विपत्ति की सूचना दे रहे हैं। क्या भगवान श्रीकृष्णचन्द्र इस लोक को छोड़ कर चले गये या अन्य कोई दुःखदाई घटना होने वाली है?”
उसी क्षण आतुर अवस्था में अर्जुन द्वारिका से वापस आये। उनके नेत्रों से अश्रु बह रहे थे, शरीर कान्तिहीन था और गर्दन झुकी हुई थी। वे आते ही धर्मराज युधिष्ठिर के चरणों में गिर पड़े। तब युधिष्ठिर ने घबरा कर पूछा – “हे अर्जुन! द्वारिकापुरी में हमारे सम्बंधी और बन्धु-बान्धव यादव लोग तो प्रसन्न हैं न? हमारे नाना शूरसेन तथा छोटे मामा वसुदेव तो कुशल से हैं न? हमारी मामी देवकी अपनी सातों बहनों तथा पुत्र-पौत्रादि सहित प्रसन्न तो हैं न? राजा उग्रसेन और उनके छोटे भाई देवक तो कुशल से हैं न? प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, साम्ब, ऋषभ आदि तो प्रसन्न हैं न? हमारे स्वामी भगवान श्रीकृष्णचन्द्र उद्धव आदि अपने सेवकों सहित कुशल से तो हैं न? वे अपनी सुधर्मा सभा में नित्य आते हैं न? सत्यभामा, रुक्मिणी, जाम्वन्ती आदि उनकी सोलह सहस्त्र एक सौ आठ पटरानियाँ तो नित्य ठनकी सेवा में लीन रहती हैं न? हे भाई अर्जुन! तुम्हारी कान्ति क्षीण क्यों हो रही है और तुम श्रीहीन क्यों हो रहे हो?”
धर्मराज युधिष्ठिर के प्रश्नों के बौछार से अर्जुन और भी व्याकुल एवं शोकाकुल हो गये, उनका रंग फीका पड़ गया, नेत्रों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी, हिचकियाँ बँध गईं, रुँधे कण्ठ से उन्होंने कहा – “हे भ्राता! हमारे प्रियतम भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने हमें ठग लिया, वे हमें त्याग कर इस लोक से चले गये। जिनकी कृपा से मेरे परम पराक्रम के सामने देवता भी सिर नहीं उठाते थे मेरे उस परम पराक्रम को भी वे अपने साथ ले गये, प्राणहीन मुर्दे जैसी गति हो गई मेरी। मैं द्वारिका से भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की पत्नियों को हस्तिनापुर ला रहा था किन्तु मार्ग में थोड़े से भीलों ने मुझे एक निर्बल की भाँति परास्त कर दिया। मैं उन अबलाओं की रक्षा नहीं कर सका। मेरी वे ही भुजाएँ हैं, वही रथ है, वही घोड़े हैं, वही गाण्डीव धनुष है और वही बाण हैं जिन से मैंने बड़े बड़े महारथियों के सिर बात की बात में उड़ा दिये थे। जिस अर्जुन ने कभी अपने जीवन में शत्रुओं से मुहकी नहीं खाई थी वही अर्जुन आज कायरों की भाँति भीलों से पराजित हो गया। उनकी सम्पूर्ण पत्नियों तथा धन आदि को भील लोग लूट ले गये और मैं निहत्थे की भाँति खड़ा देखता रह गया। उन भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के बिना मेरी सम्पूर्ण शक्ति क्षीण हो गई है।
“आपने जो द्वारिका में जिन यादवों की कुशल पूछी है, वे समस्त यादव ब्राह्मणों के श्राप से दुर्बुद्धि अवस्था को प्राप्त हो गये थे और वे अति मदिरा पान कर के परस्पर एक दूसरे को मारते मारते मृत्यु को प्राप्त हो गये। यह सब उन्हीं भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की लीला है।”
अर्जुन के मुख से भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के स्वधाम गमन और सम्पूर्ण यदुवंशियों के नाश का समाचार सुन कर धर्मराज युधिष्ठिर ने तुरन्त अपना कर्तवय निश्चित कर लिया और अर्जुन से बोले – “हे अर्जुन! भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने अपने इस लौकिक शरीर से इस पृथ्वी का भार उतार कर उसे इस प्रकार त्याग दिया जिस प्रकार कोई काँटे से काँटा निकालने के पश्चात उन कोनों काँटों को त्याग देता है। अब घोर कलियुग भी आने वाला है। अतः अब शीघ्र ही हम लोगों को स्वर्गारोहण करना चाहिये।” जब माता कुन्ती ने भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के स्वधाम गमन का समाचार सुना तो उन्होंने भगवान श्रीकृष्णचन्द्र में अपना ध्यान लगा कर शरीर त्याग दिया।
धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने महापराक्रमी पौत्र परीक्षित को सम्पूर्ण जम्बूद्वीप का राज्य देकर हस्तिनापुर में उसका राज्याभिषेक किया और शूरसेन देश का राजा बनाकर मथुरापुरी में अनिरुद्ध के पुत्र बज्र का राजतिलक किया। तत्पश्चात् परमज्ञानी युधिष्ठिर ने प्रजापति यज्ञ किया और भगवान श्रीकृष्णचन्द्र में लीन होकर सन्यास ले लिया। उन्होंने मान, अपमान, अहंकार तथा मोह को त्याग दिया और मन तथा वाणी को वश में कर लिया। सम्पूर्ण विश्व उन्हें ब्रह्म रूप दृष्टिगोचर होने लगा। उन्होंने अपने केश खोल दिये, राजसी वस्त्राभूषण त्याग कर चीर वस्त्र धारण कर के और अन्न जल का परित्याग करके मौनव्रत धारण कर लिया। इतना करने के बाद बिना किसी की ओर दृष्टि किये घर से बाहर उत्तर दिशा की ओर चल दिये।राजा संसार की अनित्यता का विचार करके द्रौपदी तथा भाइयों को साथ ले हिमालय की तरफ महाप्रस्थान के पथ पर अग्रसर हुए। उस महापथ में क्रमश: द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेन एक-एक करके गिर पड़े। इससे राजा शोकमग्न हो गये। तदनन्तर वे इन्द्र के द्वारा लाये हुए रथ पर आरूढ़ हो (दिव्य रूप धारी) भाइयों सहित स्वर्ग को चले गये। वहाँ उन्होंने दुर्योधन आदि सभी धृतराष्ट्रपुत्रों को देखा। तदनन्तर (उन पर कृपा करने के लिये अपने धाम से पधारे हुए) भगवान् वासुदेव का भी दर्शन किया इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुईं यह मैंने तुम्हें महाभारत का प्रसंग सुनाया है। जो इसका पाठ करेगा, वह स्वर्गलोक में सम्मानित होगा।