Wednesday, 5 September 2012

भाग्य का अर्थ

भाग्य का अर्थ है 
प्रारब्ध रचित. हमारे कर्मो के अनुसार हमारे जीवन की जिस गति का निर्माण होता है वही है भाग्य. उसी के अनुसार हमारे जीवन के काल खंड मे घटनाओ का एक क्रम बनता है जिसमे अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियो का समावेश होता है और वही हमारा जीवन है. हमारे लिए जो भी अनुकूल होता है उसे हम सौभाग्य का प्रतीक मानते है. उसी क्रम मे मनुष्य अपनी गति के अनुसार सौभाग्य को प्राप्त करता है.
कर्म बंधन से मुक्त होने के लिए ही तन्त्र का चयन आदि काल से रहा है. किस प्रकार से प्रकृति को अपना सहयोगी बनाया जाये यही मूल चिंतन रहा. दुर्भाग्य को सौभाग्य मे बदलने के लिए कई प्रकार के विधानों का निर्माण हुआ. उसी प्रकार सौभाग्य की वृद्धि के लिए भी सरल विधानों का संकलन हुआ. भाग्य आपके अनुकूल है तो जीवन भी आपका अनुकूल ही रहेगा. श्रीकृष्ण का व्यक्तीत्व हमेशा मायामाय रहा है, सम्पूर्ण सृष्टि को अपने अंदर समाहित किए हुए भी वह जीवन भर अत्यधिक सामान्य बने रहे. उन्होंने योग का प्रचार किया और कर्म को समजाने के लिए मानव जन्म लिया. लेकिन साथ ही साथ उस कर्म से प्राप्त भाग्य की वृद्धि के लिए भी कई विधानों का समावेश किया था. श्रीकृष्ण से सबंधित कई ग्रन्थ है जो की अब लुप्त है जिसमे योग, तन्त्र, पारद, सूर्य विज्ञान व् तन्त्र से सबंधित साधनाए सामिल है. ऐसा ही एक ग्रन्थ है कृष्णयमल. जिसमे उन सरल व् अचूक प्रयोगों का समावेश किया गया है जो की कृष्ण से सबंधित अत्यधिक तीव्र विधान है.
इसी क्रम मे जीवन मे सौभाग्य की वृद्धि के लिए भी एक अत्यधिक प्रभावकारी प्रयोग है जो की आप सब के मध्य रखना चाहूँगा
इस साधना को दिन या रात किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन समय रोज एक ही रहे. इसके साथ ही साथ मंत्रजाप की संख्या भी रोज एक ही रहे. साधक इस साधना को किसी भी दिन शुरू कर सकते है
वस्त्र सफ़ेद रहे दिशा उत्तर, साधक अपने सामने कृष्ण का विराट रूप का कोई चित्र स्थापित करे और सामान्य पूजन करे उसके बाद निम्न मंत्र की ३, ७ या २१ माला मंत्र जाप करे. इसमें स्फटिक माला का उपयोग किया जाता है.
ॐ जगतगुरु सर्व सुख सौभाग्य वृद्धिं नमः

मन्त्र जाप के पहले और बाद मे गुरु मंत्र की १ – १ माला करना ना भूले.
यह क्रम २१ दिन तक चलता रहे. साधक इन २१ दिनों मे परिणामों का अनुभव खुद ही करने लगेगा, और २१ दिनों बाद सौभाग्य की वृद्धि सभी दिशाओ मे नज़र आएगी चाहे वह सबंध, व्यापार, सहकार या फिर किसी भी पक्ष से सबंधित हो.

श्री अर्जुन-कृत श्रीदुर्गा स्तवन


श्री अर्जुन-कृत श्रीदुर्गा स्तवन

विनियोग -
ॐ अस्य श्रीभगवती दुर्गा स्तोत्र मन्त्रस्य श्रीकृष्णार्जुन स्वरूपी नर नारायणो ऋषिः, अनुष्टुप् छन्द, श्रीदुर्गा देवता, ह्रीं बीजं, ऐं शक्ति, श्रीं कीलकं, मम अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास-
श्रीकृष्णार्जुन स्वरूपी नर नारायणो ऋषिभ्यो नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीदुर्गा देवतायै नमः हृदि, ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये, ऐं शक्त्यै नमः पादयो, श्रीं कीलकाय नमः नाभौ, मम अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कर न्यास -
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्याम नमः, ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा, ॐ ह्रूं मध्यमाभ्याम वषट्, ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां हुं, ॐ ह्रौं कनिष्ठाभ्यां वौष्ट्, ॐ ह्रः करतल करपृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यास -ॐ ह्रां हृदयाय नमः, ॐ ह्रीं शिरसें स्वाहा, ॐ ह्रूं शिखायै वषट्, ॐ ह्रैं कवचायं हुं, ॐ ह्रौं नैत्र-त्रयाय वौष्ट्, ॐ ह्रः अस्त्राय फट्।

ध्यान -
सिंहस्था शशि-शेखरा मरकत-प्रख्या चतुर्भिर्भुजैः,
शँख चक्र-धनुः-शरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता।
आमुक्तांगद-हार-कंकण-रणत्-कांची-क्वणन् नूपुरा,
दुर्गा दुर्गति-हारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्-कुण्डला॥

मानस पूजन -
ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः लं पृथिव्यात्मकं गन्धं समर्पयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः हं आकाशात्मकं पुष्पं समर्पयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः यं वाय्वात्मकं धूपं घ्रापयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः रं वहृ्यात्मकं दीपं दर्शयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः सं सर्वात्मकं ताम्बूलं समर्पयामि।

श्रीअर्जुन उवाच -
नमस्ते सिद्ध-सेनानि, आर्ये मन्दर-वासिनी,
कुमारी कालि कापालि, कपिले कृष्ण-पिंगले॥१॥

भद्र-कालि! नमस्तुभ्यं, महाकालि नमोऽस्तुते।
चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं, तारिणि वर-वर्णिनि॥२॥

कात्यायनि महा-भागे, करालि विजये जये,
शिखि पिच्छ-ध्वज-धरे, नानाभरण-भूषिते॥३॥

अटूट-शूल-प्रहरणे, खड्ग-खेटक-धारिणे,
गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे, नन्द-गोप-कुलोद्भवे॥४॥

महिषासृक्-प्रिये नित्यं, कौशिकि पीत-वासिनि,
अट्टहासे कोक-मुखे, नमस्तेऽस्तु रण-प्रिये॥५॥

उमे शाकम्भरि श्वेते, कृष्णे कैटभ-नाशिनि,
हिरण्याक्षि विरूपाक्षि, सुधू्राप्ति नमोऽस्तु ते॥६॥

वेद-श्रुति-महा-पुण्ये, ब्रह्मण्ये जात-वेदसि,
जम्बू-कटक-चैत्येषु, नित्यं सन्निहितालये॥७॥

त्वं ब्रह्म-विद्यानां, महा-निद्रा च देहिनाम्।
स्कन्ध-मातर्भगवति, दुर्गे कान्तार-वासिनि॥८॥

स्वाहाकारः स्वधा चैव, कला काष्ठा सरस्वती।
सावित्री वेद-माता च, तथा वेदान्त उच्यते॥९॥


स्तुतासि त्वं महा-देवि विशुद्धेनान्तरात्मा।
जयो भवतु मे नित्यं, त्वत्-प्रसादाद् रणाजिरे॥१०॥

कान्तार-भय-दुर्गेषु, भक्तानां चालयेषु च।
नित्यं वससि पाताले, युद्धे जयसि दानवान्॥११॥

त्वं जम्भिनी मोहिनी च, माया ह्रीः श्रीस्तथैव च।
सन्ध्या प्रभावती चैव, सावित्री जननी तथा॥१२॥

तुष्टिः पुष्टिर्धृतिदीप्तिश्चन्द्रादित्य-विवर्धनी।
भूतिर्भूति-मतां संख्ये, वीक्ष्यसे सिद्ध-चारणैः॥१३॥

॥ फल-श्रुति ॥

यः इदं पठते स्तोत्रं, कल्यं उत्थाय मानवः।
यक्ष-रक्षः-पिशाचेभ्यो, न भयं विद्यते सदा॥१॥

न चापि रिपवस्तेभ्यः, सर्पाद्या ये च दंष्ट्रिणः।
न भयं विद्यते तस्य, सदा राज-कुलादपि॥२॥

विवादे जयमाप्नोति, बद्धो मुच्येत बन्धनात्।
दुर्गं तरति चावश्यं, तथा चोरैर्विमुच्यते॥३॥

संग्रामे विजयेन्नित्यं, लक्ष्मीं प्राप्न्नोति केवलाम्।
आरोग्य-बल-सम्पन्नो, जीवेद् वर्ष-शतं तथा॥४॥
॥ इति श्रीमहाभारते भीष्म पर्व  श्री अर्जुन कृत श्रीदुर्गा स्तवन सम्पूर्णम्॥