Sunday, 19 August 2012

अधिक मास माहात्म्य


अधिक मास माहात्म्य (पुरुषोत्तम मास)
अधिक मास में सूर्य की संक्रांति (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) न होने के कारन इसे ‘मलमास’ (मलिन मास ) कहा गया है | भगवान कृष्ण ने इसका स्वामित्व स्वीकार कर अपना ‘पुरुषोत्तम ’ नाम इसे प्रदान किया है |

                    
व्रत विधि :
इस मास में आँवले व तिल का उबटन शरीर पर मल कर स्नान करना , आँवले के पेड़ के निचे भोजन करना भगवान श्री पुरुषोत्तम को अतिशय प्रिय है , साथ ही यह स्वास्थ्यप्रद और प्रसंन्ताप्रद भी है |

इस मास में भगवान के मंदिर , जलाशय या नदी में अथवा तुलसी , पीपल आदि पूजनीय वृक्षों के सम्मुख दीप-दान करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं , दुःख शोकों का नास होता है , वंशदीप बढ़ता है , ऊँचा सान्निध्य मिलता है तथा आयु बढती है |

भगवान श्री कृष्ण इस मास की व्रत विधि एवं महिमा बताते हुए कहते हैं : “इस मास में मेरे उद्देश्य से जो स्नान दान जप होम स्वध्याय , पित्रितर्पण तथा देवार्चन किया जाता है , वह सब अक्षय हो जाता है | जिन्होंने प्रमाद से मल मास को बिता दिया , उनका जीवन मनुष्य लोक में दारिद्र्य , पुत्रशोक तथा पाप के कीचड़ से निन्दित हो जाता है इसमें संदेह नहीं |”

सुगन्धित चन्दन , अनेक प्रकार के फूल , मिष्टान्न , नैवैद्द्य , धुप दीप आदि से लक्ष्मी सहित सनातन भगवान तथा पितामह भीष्म का पूजन करें | घंटा , मृदंग , और शंख की ध्वनि के साथ कपूर और चन्दन से आरती करें | ये न हों तो रुई की बत्ती से ही आरती करें | इससे अनंत फल की प्राप्ति होती है | चन्दन , अक्षत , और पुष्पों के साथ तांबे के पात्र में पानी रख कर भक्ति से प्रातः पूजन के पहले या बाद में अर्घ्य दें | अर्घ्य देते समय भगवान ब्रह्माजी के साथ मेरा स्मरण करके इस मंत्र को बोलें :

देवदेव महादेव प्रलयोत्पत्तिकारक |‍‌‍
गृहाणार्घ्यंमिमं देव कृपां कृत्वा ममोपरि ||
स्वयम्भुवे नमस्तुभ्यं ब्रह्मणेऽमिततेजसे |
नमोस्तुते श्रीयानन्त दयां कुरु ममोपरि ||

‘
हे देवदेव ! हे महादेव ! हे प्रलय और उत्पत्ति करने वाले ! हे देव ! मुझ पर कृपा कर के इस अर्घ्य को ग्रहण कीजिये | तुझ स्यम्भु के लिए नमस्कार तथा तुझ अमित तेज ब्रह्मा के लिए नमस्कार | हे अनंत ! लक्ष्मीजी के साथ आप मुझ पर कृपा करें | ’

मल मास का व्रत दारिद्रय , पुत्रशोक और वैधव्य का नाशक है | चतुर्दशी के दिन उपवास कर अंत में उद्द्यापन करने से मनुष्य सब पापों से छुट जाता है | यदि दारिद्रय हो तो व्यतिपात योग में , द्वादशी पूर्णिमा , चतुर्दशी , नवमी और अष्टमी के दिन शोक विनाशक उपरोक्त व्रत को करना चाहिए जो उपचार मिल जाये उनसे ही यह कर ले |
मलमास में संध्योपासन , तर्पण , श्राद्ध , दान , नियम व्रत ये सब फल देते हैं | इसके व्रत से ब्रह्महत्या आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं |

विधिवत सेवते यस्तु पुरुषोत्तममादरात् |
कुलं स्वकीयमुद् धृत्य मामेवैष्यत्यसंशयम् ||

प्रति तीसरे वर्ष में पुरुषोत्तम मास के आगमन पर जो व्यक्ति श्रद्धा- भक्ति के साथ व्रत , उपवास , पूजा आदि शुभकर्म करता है , निःसंदेह वह अपने समस्त परिवार के साथ मेरे लोक में पहुँच कर मेरा सानिध्य प्राप्त करता है

इस महीने में केवल ईश्वर के उद्देश्य से जो जप , सत्संग व सत्कथा –श्रवण , हरिकीर्तन , व्रत, उपवास स्नान , दान या पूजनादि किये जाते हैं , उनका अक्षय फल होता है और व्रती के संपूर्ण अनिष्ट नष्ट हो जाते हैं | निष्काम भाव से किये जाने वाले अनुष्ठानों के लिए यह अत्यंत श्रेष्ठ समय है| देवी भगवत के अनुसार यदि दान आदि का सामर्थ्य न हो तो संतों- महापुरुषों की सेवा सर्वोत्तम है , इससे तीर्थ स्नानादि के सामान फल होता है |

अधिक मास में वर्जित
इस मास में सभी सकाम कर्म एवं व्रत वर्जित हैं |जैसे – कुएँ , बावली , तालाब और बाग आदि का आरम्भ तथा प्रतिष्ठा , नवविवाहिता वधु का प्रवेश , देवताओं का स्थापन (देवप्रतिष्ठा) , यज्ञोपवित संस्कार , विवाह , नामकर्म , माकन बनाना , नए वस्त्र और अलंकार पहनना आदि |

अधिक मास में करने योग्य
प्राणघातक रोग आदि की निवृत्ति के लिए रुद्रजाप आदि अनुष्ठान , दान व जप कीर्तन आदि , पुत्रजन्म के कृत्य , पित्रिमरण के श्रद्धादी तथा गर्भाधान , पुंसवन जैसे संस्कार किये जाते हैं |

Friday, 17 August 2012

श्री गुरु स्तोत्रम्

          श्री महादेव्युवाच
 
गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव वा
विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे
 श्री महादेवी (पार्वती) ने कहा : हे दयानिधि शंभु ! गुरुमंत्र के देवता अर्थात् श्री गुरुदेव एवं उनका आचारादि धर्म क्या है - इस बारे में वर्णन करें
 
    श्री महादेव उवाच
 जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम्
 उत्कल काशीगंगामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं .. १..
 श्री महादेव बोले : जीवात्मा-परमात्मा का ज्ञान, दान, ध्यान, योग पुरी, काशी या गंगा तट पर मृत्यु - इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..१..
 
प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम्
 भार्यामिष्टं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ..२..
 प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र - इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..२..
 
वानप्रस्थं यतिविधधर्मं पारमहंस्यं भिक्षुकचरितम्
 साधोः सेवां बहुसुखभुक्तिं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ..३..
 वानप्रस्थ धर्म, यति विषयक धर्म, परमहंस के धर्म, भिक्षुक अर्थात् याचक के धर्म - इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..३..
 
 
विष्णो भक्तिं पूजनरक्तिं वैष्णवसेवां मातरि भक्तिम्
 विष्णोरिव पितृसेवनयोगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ..४..
 भगवान विष्णु की भक्ति, उनके पूजन में अनुरक्ति, विष्णु भक्तों की सेवा, माता की भक्ति, श्रीविष्णु ही पिता रूप में हैं, इस प्रकार की पिता सेवा - इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..४..
 
प्रत्याहारं चेन्द्रिययजनं प्राणायां न्यासविधानम्
इष्टे पूजा जप तपभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ..५..
 प्रत्याहार और इन्द्रियों का दमन, प्राणायाम, न्यास-विन्यास का विधान, इष्टदेव की पूजा, मंत्र जप, तपस्या व भक्ति - इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है..५..
 
काली दुर्गा कमला भुवना त्रिपुरा भीमा बगला पूर्णा
 श्रीमातंगी धूमा तारा न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं..६..
 काली, दुर्गा, लक्ष्मी, भुवनेश्वरि, त्रिपुरासुन्दरी, भीमा, बगलामुखी (पूर्णा), मातंगी, धूमावती व तारा ये सभी मातृशक्तियाँ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..६..
 
मात्स्यं कौर्मं श्रीवाराहं नरहरिरूपं वामनचरितम्
 नरनारायण चरितं योगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ..७..
 भगवान के मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, वामन, नर-नारायण आदि अवतार, उनकी लीलाएँ, चरित्र एवं तप आदि भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..७..
 
श्रीभृगुदेवं श्रीरघुनाथं श्रीयदुनाथं बौद्धं कल्क्यम्
 अवतारा दश वेदविधानं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ..८..
 भगवान के श्री भृगु, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि आदि वेदों में वर्णित दस अवतार श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..८..
 
गंगा काशी कान्ची द्वारा मायाऽयोध्याऽवन्ती मथुरा
 यमुना रेवा पुष्करतीर्थ न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ..९..
 गंगा, यमुना, रेवा आदि पवित्र नदियाँ, काशी, कांची, पुरी, हरिद्वार, द्वारिका, उज्जयिनी, मथुरा, अयोध्या आदि पवित्र पुरियाँ व पुष्करादि तीर्थ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..९..
 
गोकुलगमनं गोपुररमणं श्रीवृन्दावन-मधुपुर-रटनम्
एतत् सर्वं सुन्दरि ! मातर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ..१०..
 हे सुन्दरी ! हे मातेश्वरी ! गोकुल यात्रा, गौशालाओं में भ्रमण एवं श्री वृन्दावन व मधुपुर आदि शुभ नामों का रटन - ये सब भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..१०..
 
तुलसीसेवा हरिहरभक्तिः गंगासागर-संगममुक्तिः
 किमपरमधिकं कृष्णेभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ..११..
 तुलसी की सेवा, विष्णु व शिव की भक्ति, गंगा सागर के संगम पर देह त्याग और अधिक क्या कहूँ परात्पर भगवान श्री कृष्ण की भक्ति भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..११..
 
एतत् स्तोत्रम् पठति च नित्यं मोक्षज्ञानी सोऽपि च धन्यम्
ब्रह्माण्डान्तर्यद्-यद् ध्येयं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं ..१२..
 इस स्तोत्र का जो नित्य पाठ करता है वह आत्मज्ञान एवं मोक्ष दोनों को पाकर धन्य हो जाता है
निश्चित ही समस्त ब्रह्माण्ड मे जिस-जिसका भी ध्यान किया जाता है, उनमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है ..१२..
 
वृहदविज्ञान परमेश्वरतंत्रे त्रिपुराशिवसंवादे श्रीगुरोःस्तोत्रम्
यह गुरुस्तोत्र वृहद विज्ञान परमेश्वरतंत्र के अंतर्गत त्रिपुरा-शिव संवाद में आता है